श्रीमद्भागवत कथा : जयन्ती धाम मे श्रीमद्भागवत कथा का शुभारंभ,उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़, भागवत प्रवक्ता ने बताया कथा श्रवण का महत्व
Bakhtavar Express
Tue, Aug 4, 2026
चिराखान।जयन्ती दिव्य धाम सेवा समिति के तत्वावधान में आयोजित सात दिवसीय संगीतमय श्रीमद्भागवत कथा का मंगलवार को शुभारंभ भक्ति और उत्साह के वातावरण में हुआ। कथा प्रारंभ होने से पहले ढोल-ढमाकों एवं भजन-कीर्तन के साथ कलश यात्रा तथा श्रीमद्भागवत पोथी की शोभायात्रा निकाली गई। इसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लिया। यात्रा में कथावाचिका राष्ट्रीय कथावाचिका ममता दीदी पाठक दंतोड़िया (रतलाम) एवं यजमान पावन पोथी धारण कर चल रहे थे। कथा का शुभारंभ "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्रोच्चार के साथ हुआ।कथा के प्रथम दिवस कथा प्रवचन में ममता दीदी ने श्रीमद्भागवत कथा की महिमा का विस्तार से वर्णन करते हुए कहा कि हम बडे सौभाग्य शाली है कि हने भागवत कथा कराने एवं सुनने का अवसर मिला है चारो धाम करने से जो पुण्य मिलता है वही पुण्य भागवत कथा सुनने से मिलता है इसलिए कथा को मन लगाकर सुनना चाहिए।जिस मनुष्य ने भागवत गंगा मे डुब जाओगे तो कही भी डुबने की आवश्यकता नही है।हम बडे सौभाग्य शाली है की जिस भारत भुमि मे बडे बडे महापुरुषों ने जन्म लिया भगवान ने जन्म लिया।उसी भुमि पर हमने जन्म लिया है।संसार सागर से पार जाना है तो संत्संग की नांव मे बैठना पडेगा।हम मंदिर में विराजित मूर्ति को प्रणाम करते हैं, लेकिन घर में माता-पिता के रूप में प्रत्यक्ष भगवान को प्रणाम व उनका आदर सम्मान नहीं करते हैं। कथा का संकल्प लेना आसान है, उसे पूर्ण करना बहुत कठिन है। उन्होंने आगे कहा कि देवताओं को भी कथा सुनने का अवसर नहीं मिलता है। मनुष्य ही एक मात्र ऐसा प्राणी है। हम सौभाग्यशाली है, जो श्रीमद्भागवत कथा श्रवण कर रहे हैं। सच्चे संत का दर्शन व हरि कथा दुर्लभ है। श्रीमद्भागवत कथा सभी पुराणों का सम्राट है, उसमें स्वयं ईश्वर समाए हुए हैं। उसका एक-एक शब्द भगवान है। बीमार व्यक्ति को औषधि कड़वी लगती है, लेकिन उसका सेवन तंदुरुस्त बना देती है। ठीक उसी तरह मनुष्य को भागवत कथा रूपी औषधि भी अच्छी नहीं लगती है, लेकिन निरंतर श्रवण सभी पापों का नाश कर देती है। समाज में विकृति आ गई है, उसे समाप्त करने के लिए धर्मिक आयोजन की नितांत आवश्यकता है। ममता दीदी ने कहा कि बिना अध्यात्म, सत्संग, कथा के जीवन का कल्याण संभव नहीं है। कथा मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि मनों मंथन व मनुष्य जीवन के उद्धार के लिए होती है। व्यक्ति को नदी पार करने के लिए नाव का सहारा लेना पड़ता है, उसी तरह भवसागर को पार करने के लिए भजन, अध्यात्म व कथा रूपी नाव का सहारा लेना पड़ता है। कलियुग में व्यक्ति बिना लालच स्वार्थ के कोई कार्य नहीं करता। यहां तक कि प्रभु स्मरण भी माला के मोतियों को गिन-गिनकर करता है। यदि भगवान से प्रेम है, संबंध है तो गिनती करने की जरूरत नहीं है। आप जप करें, गिनती ठाकुरजी कर लेंगे। व्यक्ति स्वार्थी व अर्थ केंद्रित हो गया है। आनंद स्वयं में है, लेकिन घर परिवार, संतान, दुनियादारी में आनंद खोज रहा है। दूध में ही दही, मक्खन व भी है। केवल उसे मथने व मंथन की आवश्यकता है। मनुष्य को घर परिवार त्यागे बिना, प्रभु व मानव सेवा कर सत्संग में जीवन रस मिल सकता है, परंतु वह गलत दिशा में आनंद खोज रहा है। कथावाचिका ने कहा कि साधु स्वभाव का नाम है, वेशभूषा का नहीं। जिस साधु के स्वभाव में निंदा व स्तुति से फर्क नहीं पड़ता है, वही साधु है। प्राणी मात्र से स्नेह के भाव मन में हो, वही संत है। परिवर्तन बाहरी नहीं,आंतरिक व त्याग मन का होना चाहिए। कलयुग में धन की चिंता करने वाले अधिक व धर्म की चिंता करने वाले कम हो गए हैं। नारी मर्यादा में रहकर श्रृंगार करें, संस्कृति न छोड़े। हम सनातन धर्म छोड़कर पाश्चात्य संस्कृति की ओर जा रहे हैं। जबकि पाश्चात्य संस्कृति वाले सनातन की ओर प्रवेश कर रहे हैं। सनातन में ही शांति है। असत्य बोलने वाले अधिक दुखी है, झूठ बोलने के सत्कर्म नष्ट हो जाते हैं।
कथा स्थल पहुंचने पर पोथी व कथावाचिका ममता दीदी पाठक की आरती उतारकर अगवानी की गई। शाम को कथा विश्राम के समय गोपाल पाटीदार (बालौद)द्वारा आरती उतारी गई व प्रसादी वितरित की गई। कथा श्रवण करने के लिए समिति अध्यक्ष अनिल पाटीदार, उपाध्यक्ष महेश जाट ,मुन्नालाल पाटीदार, मोतीलाल पाटीदार,रमेशचन्द्र जायसवाल दसाई ,शिवनारायण जायसवाल,शंकरलाल पाटीदार, घनश्याम नायक सहित आसपास के गांव बालौद,चिराखान,पदमपुरा,दसाई,लाबरिया,खुंटपला,खिलेड़ी,आदि स्थान से धर्मप्रेमी उपस्थित थे। कथा प्रतिदिन 11 से शाम तीन बजे तक सुनाई जा रही है। दस अगस्त को कथा का समापन होगा।
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