: बेस्ट आउट ऑफ वेस्ट के स्लोगन को हकीकत मे बदला सेवानिवृत अधिकारी एसआर विश्वकर्मा ने ,70 की उम्र मे अपनी कलाकारी से अनुपयोगी वस्तुओं से बनाये धार्मिक व ऐतिहासिक भवनों के मॉडल
Admin
Sun, May 19, 2024


आरिफ शेख
सरदारपुर। बेस्ट आउट आफ वेस्ट शायद यह वाक्य सुनने में अच्छा लगे लेकिन जब कोई व्यक्ति इसे हकीकत मे बदल दे तो फिर उस कलाकार की कलाकारी की तारीफ के लिये शब्द ही कम पड जाते है और यह कार्य यदि कोई 70 साल का बुर्जुग करे तो आज की युवा पीढ़ी को ऐसे लोगों से सीख लेना चाहिये जो अपना अधिकांश समय मोबाइल मे बर्बाद करते है।
हम बात कर रहे है सरदारपुर तहसील केे छोटे से गांव पदमपुरा के निवासी और इंदौर जैसे शहर मे ग्रामीण यांत्रिकी सेवा के कार्यपालन यंत्री का दायित्व निभाने वाले सेवानिवृत्त अधिकारी एस आर विश्वकर्मा की । श्री विश्वकर्मा को कलाकारी का यह हुनर परिवार से ही मिला है। विश्वकर्मा (सुतार) का परिवार सुतारी का कार्य करता था । इसलिए परिवार के बढे सदस्य कुछ कार्य करते तो उन्हे देखकर बचपन से ही ऐसी चीजे बनाने की ललक लगी यही नहीं जब नौकरी मे आये तो वहा पर उन्होंने अपने हुनर को और तराश दिया। उनके द्वारा थर्माकोल की सीट के बनाये गये माडलो को तो विभाग ने कई कार्य मे उपयोग किया जैसे किसी युवा इंजीनियरों को प्रशिक्षण देना हो या फिर उसका मार्गदर्शन करना हो।

10 वर्ष पूर्व जब श्री विश्वकर्मा शासकीय सेवा से निवृत हुये तो कुछ समय तो उन्होने तीर्थ यात्रा एंव बच्चों के पास समय बिताया लेकिन फिर उन्होंने सोचा की कुछ ऐसा किया जाये की जो दुसरो के लिये भी आदर्श बने।
घर पर रखी अनुपयोगी वस्तुओं पर श्री विश्वकर्मा ने अपने हुनर की ऐसी कलाकारी दिखाई ही उनके द्वारा बनाए गए मॉडल हुबहु नजर आ रहे है। चाहे श्री राम मंदिर हो या मांडू का रानी रूपमती का महल हो या फिर श्री यमुनोत्री धाम,श्री गंगोत्री धाम,श्री बद्रीनाथ धाम हो या फिर इंदौर का रणजीत हनुमान मंदिर हो या कुतुब मीनार हो ।

एस.आर. विश्वकर्मा बताते है व्यक्ति कभी वृद्ध नहीं होता है बल्कि उसकी सोच वृद्ध हो जाती है। जीवन की आखिरी सांस तक व्यक्ति को अपने आप को चलायमान रखना चाहिये। बचपन,जवानी और वृद्धावस्था यह भले ही पिढी परिवर्तन की व्यवस्था हो लेकिन व्यक्ति यदि अपने आप को किसी ना किसी एक्टिविटी के माध्यम से चलायमान रखता है तो वह हमेशा स्वस्थ भी रहता है। श्री विश्वकर्मा बताया की ज्ञान अर्जन करने के लिए कोई सीमा नहीं होती है जहा पर भी कोई ज्ञान मिले उसे ग्रहण करना चाहिये।

यही नही श्री विश्वकर्मा ने अपने घर की छत पर छोटा सा गार्डन भी लगा रखा है जहा पर उन्होंने जैविक पद्धति से सब्जियों से लेकर फलो के पौधे लगा रखे है। जिससे वै प्रतिदिन ताजी सब्जियों का लुत्फ लेते रहते है। साथ ही बगीचे मे वेस्ट सामग्री से बहुत सारे आयटम बनाकर उसे सजाया गया है। मानो किसी प्रदर्शनी का प्रदर्शन हो रहा हो। कॉलोनी मे आने वाले राहगीर हो या फिर बच्चे बरबस ही उनका ध्यान इस बगीचे की और आकर्षित हो जाता है।

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