दसई : 30 साल बाद 1995 बैच का ऐतिहासिक पुनर्मिलन संपन्न,जहाँ वक्त थम गया, दोस्ती फिर से जवान हो गई
Bakhtavar Express
Mon, Dec 29, 2025
दसई । दसई स्थित शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय के वर्ष 1995 बैच के विद्यार्थियों के लिए वह दिन सिर्फ़ एक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि यादों की किताब का फिर से खुलना था। पूरे 30 वर्षों बाद हुए इस भव्य पुनर्मिलन समारोह ने बीते हुए दिनों, शरारतों, सपनों और सच्ची दोस्ती को एक बार फिर ज़िंदा कर दिया।
इस आत्मीय मिलन में विद्यार्थी अपने परिजनों के साथ पहुँचे। करीब 150 से अधिक लोगों की मौजूदगी ने यह साबित कर दिया कि समय भले ही आगे बढ़ जाए, लेकिन दोस्ती कभी रिटायर नहीं होती।
दर्जी समाज धर्मशाला, दसई कार्यक्रम का साक्षी बनी—जहाँ हर कोना किसी न किसी स्मृति की गवाही दे रहा था। पूरे आयोजन का भाव था —
“दोस्ती ज़िंदाबाद”,
जो हर मुस्कान, हर आलिंगन और हर नम आँख में झलक रहा था।
इस भावनात्मक मिलन को कल्पना से हकीकत तक पहुँचाने का श्रेय सतीश चावड़ा, यशवंत पाटीदार एवं शांतिलाल पाटीदार को जाता है। जिन लोगों ने बरसों पहले एक विचार को थामा और उसे इतने सुंदर आयोजन में बदल दिया।
कार्यक्रम के सबसे भावुक क्षण तब आए, जब वर्षों बाद वही शिक्षक सामने थे, जिनके साए में यह बैच बना और निखरा।
एस.एस. रावत सर (ग्वालियर), विजयंत सिंह ठाकुर (खड़वा), यादव सर (इंदौर) एवं आर्य सर (बड़वानी) की उपस्थिति ने विद्यार्थियों को फिर से छात्र बना दिया। कई आँखें नम हो गईं, कई हाथ अनायास ही चरणों की ओर बढ़ गए।
स्वर्गीय शरद ललित सर की स्मृति को नमन करते हुए श्रीमती आशा सोनपटकी जी को ससम्मान आमंत्रित किया गया। उनकी उपस्थिति ने पूरे वातावरण को भावुक और श्रद्धामय बना दिया।
सभी अतिथियों और शिक्षकों का स्वागत पुष्पवर्षा से किया गया। वह पल ऐसा था, जब गुरु भी भावनाओं से भर आए और शिष्य नतमस्तक हो गए।
इसके बाद गरमागरम पोहे-जलेबी और खमण के साथ दिन की शुरुआत हुई और औपचारिक सभा आरंभ हुई। स्वर्गीय शरद ललित जी के चित्र पर माल्यार्पण करते समय पूरे सभागार में एक गहरी खामोशी और सम्मान का भाव छा गया।
इसके बाद मंच संस्मरणों का हो गया।
किसी ने शरारतों को याद किया, किसी ने गुरुओं की सख़्ती में छिपा प्यार बताया। किसी ने कहा—
“सर की गाड़ी की हवा निकाल देते थे…”
तो किसी ने हँसते हुए माना—“सर से पैसे उधार लेते थे… और वो दे भी देते थे।” हँसी के ठहाकों के बीच कई बार आँखें भी भर आईं।
तीस साल बाद मिले दोस्त—कोई मोटा हो गया था, कोई दुबला, किसी के बाल सफ़ेद हो गए थे, कोई आज भी वैसा ही था। कोई पत्नी और बच्चों के साथ आया, तो कोई पति के साथ। सूट-बूट और साड़ियों के बीच भी अंदर का बच्चा वही था।
नाच, ठहाके, गले मिलना, और अचानक छलक पड़ते आँसू—हर भावना खुलकर सामने आई।
वरिष्ठ छात्रों श्रीमती चेतना जोशी, सुभाष मंडलेचा एवं राकेश नाहर ने भी मंच साझा किया और अपने अनुभवों से माहौल को और आत्मीय बना दिया। कार्यक्रम का संचालन विश्वनाथ जोशी, अजय जोशी एवं ओमप्रकाश टेलर ने इतने रोचक और अपनत्व भरे अंदाज़ में किया कि पूरा आयोजन एक पारिवारिक उत्सव जैसा महसूस हुआ।सभी ने पारंपरिक दाल-बाफले-लड्डू का स्वाद लिया, जो स्वाद के साथ-साथ गाँव और बचपन की खुशबू भी लेकर आया।आने वाले वर्षों में इंदौर में भी इसी तरह के पुनर्मिलन का संकल्प लिया गया, जिसे इंदौर टीम की ओर से दिवेश विश्वकर्मा ने पूरे उत्साह के साथ व्यक्त किया।कार्यक्रम के अंत में सबने एक-दूसरे से फिर मिलने का वादा किया।
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